भारत में लोकतंत्र की नींव प्रत्येक वयस्क नागरिक के मताधिकार पर टिकी है। आजादी के बाद से सभी वयस्क नागरिकों को मतदाता सूची में शामिल करना हमारे लोकतंत्र का मकसद रहा है, जिसे हम सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार से भी जानते हैं, लेकिन बिहार में शुरू किया गया विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया ने इस बुनियाद को हिलाने की कोशिश की है।
चुनाव आयोग के 24 जून को जारी नोटिफिकेशन के अनुसार, SIR प्रक्रिया पूरे देश में लागू की जाएगी। चुनाव आयोग ने सभी राज्यों के CEOs के साथ मीटिंग करके 01.01.2026 को क्वालिफाइंग डेट (मतदाता सूची के लिए) तय की है।
असम, यूपी, पश्चिम बंगाल, दिल्ली और दक्षिण के राज्यों में SIR को लेकर तैयारियां शुरू हो गई हैं, लेकिन इसके लिए ज़रूरी मानकों, प्रक्रियाओं और प्रोटोकॉल पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है। इन मुद्दों को सुलझाए बिना बिहार के बाहर इस रिवीजन को दोहराने के बारे में सोचना भी उचित नहीं होगा।
आयोग का तर्क है कि यह मतदाता सूची को अपडेट करने और सुधारने के लिए आवश्यक है। हालांकि, बिहार में अचानक इतनी बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने और प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी ने सवाल खड़े कर दिए हैं।
24 जून का यह आदेश अचानक आया, जिसमें “स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न” नामक संशोधन का नया तरीका गढ़ लिया गया, जो क़ानून में था ही नहीं। चुनाव आयोग के द्वारा 1950 के जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 21(3) का हवाला दिया गया, जिसे अब तक सिर्फ एक बार (2003 में उत्तर प्रदेश के ठाकुरद्वारा विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची फिर से लिखने के लिए) इस्तेमाल किया गया था। यह मतदाता सूची का संशोधन नहीं है, यह कोई सामान्य प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह मतदाता सूची का नए सिरे से पुनर्लेखन है, इसके लिए पर्याप्त समय चाहिए होता है।
साल 2002-2003 में जब गहन पुनरीक्षण हुआ तब महाराष्ट्र और अरुणाचल प्रदेश को उस गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया से छूट दी गई थी। इसका कारण था इन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने थे।

2002-03 का पुनरीक्षण, मई 2002 से जनवरी 2003 में अंतिम सूची प्रकाशित होने तक कुल 243 दिनों यानी लगभग आठ महीने तक चला था, जो झारखंड, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और पंजाब समेत छह अन्य राज्यों में भी लागू हुआ था। इसके बिल्कुल विपरीत, 2025 का पूरा विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) केवल 97 दिनों में समेट दिया गया है।
देश में जब भी गहन पुनरीक्षण हुआ है, उस समय चुनावी राज्यों और समय-सीमा का ध्यान रखा गया है। यह पहली बार है जब इतनी फुर्ती में चुनाव आयोग इस वोटर रिवीजन की प्रक्रिया को अपने मैनुअल की धज्जियां उड़ाते हुए लागू कर रहा है।
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा (62)
एक बार अगर किसी व्यक्ति का नाम वोटर लिस्ट में दर्ज हो गया तो क़ानून के मुताबिक़ उसे वोट डालने का अधिकार है। ये अधिकार संसद ने सुरक्षित किया है और इसे ऐसे ही नहीं छीना जा सकता। भले ही व्यक्ति जेल में हो, जब तक वो कानूनी रूप से अयोग्य घोषित न हो, नाम लिस्ट से नहीं हट सकता।
1950 के प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा (16) और मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया इस बात की गारंटी देती है कि किसी का मताधिकार बिना उचित जांच और कारण के छीना नहीं जा सकता।
भारतीय निर्वाचन प्रणाली में किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हटाने के लिए कानूनी रूप से केवल दो वजहें मान्य हैं:
- व्यक्ति मानसिक रूप से अस्वस्थ घोषित हो।
- वह विदेशी नागरिक हो।
मतदान करने के लिए, किसी व्यक्ति का निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में नाम होना ज़रूरी है। हालाँकि, अगर वह मतदाता सूची में शामिल भी है तो चुनाव के समय, वोट डालते समय, वह 1950 के अधिनियम की धारा 16 में उल्लिखित किसी भी अयोग्यता से ग्रस्त है तो उसका मतदान का अधिकार समाप्त हो जाएगा।
इंद्रजीत बरुआ केस में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची में किसी का नाम हटाने से पहले उचित प्रक्रिया और आपत्ति सुनवाई आवश्यक है। बिना कारण और प्रक्रिया का पालन करना नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है।

चुनाव आयोग की कार्यकारी शक्तियाँ और सीमाएं –
ECI के पास “जैसा उचित समझे वैसा करने” का कुछ हद तक अधिकार है (sub-section 3), लेकिन वो भी नियमों RPA 1950 और संसद द्वारा तय प्रक्रिया के भीतर रहकर।
चुनाव आयोग केवल वही रिविजन कर सकता है, जो कानून ने तय किया है —
- वार्षिक पुनरीक्षण (Annual Revision
- Summary Revision
- गहन पुनरीक्षण (Intensive Revision)
बशर्ते इसमें भी RPA और नियमों के अनुसार नोटिस और आपत्ति की प्रक्रिया अपनाई जाए।
ECI मनमाने ढंग से किसी भी “साल” को आधार बनाकर (जैसे 2003) पूरी सूची को “पीछे ले जाकर” नहीं बदल सकता।
ऐसा करने पर यह RPA 1950 की Sections 21-23 को बाईपास करना होगा।
यह सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में कहा गया है कि अनुच्छेद 324 का अधिकार “असीमित” नहीं है। (उदा. Mohinder Singh Gill v. Chief Election Commissioner, 1978 में कोर्ट ने कहा था — ECI का अधिकार plenary है, लेकिन यह संसद के बनाए कानूनों को override नहीं कर सकता।)
संसद ने वोटर लिस्ट बनाने और संशोधन के लिए बहुत सख़्त प्रक्रिया बनाई है। ECI इन प्रक्रियाओं को नज़रअंदाज़ करके मनमाने ढंग से पूरी लिस्ट पीछे ले जाकर नहीं बदल सकता।
ECI के पास 2003 को आधार मानकर पूरी लिस्ट को खंगालने और नाम हटाने का अधिकार नहीं है। अगर इसे सही मान लिया गया तो भविष्य में कोई भी सरकार या आयोग वोटर लिस्ट से मनमानी कटौती कर सकता है। साथ ही यह सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार (अनुच्छेद 326) के मूल अधिकार को कमजोर करता है।

चुनाव आयोग के मैनुअल (2023) का नॉन-कम्प्लायंस (उल्लंघन)
चुनाव आयोग ने 2023 में जो आधिकारिक नियम, गाइडलाइन या प्रक्रियाएँ (मैनुअल) जारी की थीं, उनका सही तरीके से पालन नहीं हुआ या उन्हें नज़रअंदाज़ किया गया।
जैसे;
चुनाव आयोग के मैनुअल (पैरा 11.4.5) के मुताबिक, हर उस मतदान केंद्र पर जहाँ वोटर डिलीट होने का प्रतिशत >2% से ज्यादा है, हर उस बूथ पर —ERO को व्यक्तिगत रूप से cross-verification करना चाहिए था, राज्य में 84,675 ऐसे बूथ हैं, जहाँ इसका उल्लंघन हुआ।
64 बूथों पर 400 से 600+ नामों का डिलीशन हुआ— AERO द्वारा “टॉप 20 बूथ” चेक (11.4.3) का पालन नहीं हुआ।
AERO को ख़ास मामलों में खुद फील्ड पर जाकर जाँच करनी थी:
- ऐसे घर जिनमें 10 से ज़्यादा वोटर (electors) दर्ज हैं। बिहार में करीब 16.9 लाख घर ऐसे हैं, जहाँ हर एक घर में (10+ से ज्यादा वोटर्स हैं) इनमें करीब 2.78 करोड़ मतदाता रहते हैं। (कुछ घरों में 800 से अधिक मतदाता) की जाँच का मामला बनता है। AERO को इसकी फिजिकल जांच करनी थी, जो कि नहीं हुई। (पैरा 11.4.3)
- AERO को BLO द्वारा किए गए वेरिफ़िकेशन का 1% रैंडम चेक करना है। (मतलब, BLO ने जितने घरों/वोटरों को वेरिफ़ाई किया, उनमें से 1% अलग-अलग जगहों से चुनकर खुद देखना।) इसका सार्वजनिक डोमेन में कोई रिकॉर्ड मौजूद नहीं है।
- इसके अलावा, (पैरा 11.4.3) में ERO को वोटर जोड़ने/हटाने वाले बूथों की जाँच करने का निर्देश है। अगर इसका ठीक से पालन किया गया होता तो इससे 1,988 बूथों की जाँच करनी पड़ती, जहाँ 200 से अधिक मतदाता हटाए गए थे। क्या बिहार की किसी जिले में ERO ने ऐसा किया, इसका कोई रिकॉर्ड पब्लिक डोमेन में नहीं है।
- असामान्य लिंग अनुपात: (ECI) ने असामान्य लिंग अनुपात वाले बूथों की जाँच (पैरा 11.4.3) का पालन नहीं किया।
तथ्य बताते हैं: - 29,509 बूथ ऐसे हैं, जहाँ हटाए गए मतदाताओं में 60% से अधिक महिलाएँ हैं।
- मसौदा सूचियों में 13,006 बूथ ऐसे हैं, उस बूथ पर महिलाओं और पुरुषों का अनुपात सामान्य (औसत) के मुकाबले काफी कम है। सामान्य हालात के मुकाबले महिलाओं के नाम हटाए जाने की दर ज़्यादा है।
- 2,023 बूथों पर महिलाओं और पुरुषों का अनुपात इतना ज़्यादा बिगड़ा हुआ है कि यह औसत से बहुत ज़्यादा अलग हो गया है।
अब आगे “दावे और आपत्तियाँ” (claims and objections) के अगले चरण पर नज़र डालें।
One-Week Disposal Rule का उल्लंघन:
नियम (11.3.6) के तहत किसी भी claim/objection को पब्लिकेशन के एक हफ़्ते बाद ही निपटाना चाहिए। लेकिन बिहार में इस प्रक्रिया की पूरी तरह से अनदेखी की गई।
हर दावा और आपत्ति CEO की वेबसाइट पर रोज़ अपडेट होना चाहिए। इसका मतलब है कि कोई भी नागरिक देख सके कि किसने क्या दावा या आपत्ति दर्ज की है। वेब एप्लिकेशन ऐसा होना चाहिए कि किसी भी पंक्ति पर क्लिक करने से पूरा आवेदन फॉर्म प्रिंट किया जा सके। यानी, सिर्फ नाम या संक्षिप्त विवरण नहीं, पूरा फॉर्म नागरिकों के लिए उपलब्ध होना चाहिए। (पैरा 11.3.4)।
हर हफ्ते के अंत में ERO सभी राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को व्यक्तिगत रूप से दावों और आपत्तियों की सूची सौंपे। इससे पार्टियों को पता चले कि कौन सा दावा या आपत्ति दर्ज हुआ है और वे उसका जवाब तैयार कर सकें (पैरा 11.3.5)।
14 सितंबर तक—दावों और आपत्तियों की समय-सीमा बीतने के दो सप्ताह बाद—बिहार के CEO की वेबसाइट पर आपत्तियों के सिर्फ 51 प्रतिशत और नए दावों के सिर्फ 39 प्रतिशत रिकॉर्ड अपलोड हुए थे। हर फॉर्म डाउनलोड करने की सुविधा एक भी मामले में उपलब्ध नहीं थी। अधिकांश मामलों में ERO ने राजनीतिक दलों के साथ साप्ताहिक बैठकें नहीं कीं, सूची सौंपना तो दूर की बात है।
चुनाव आयोग के संदिग्ध आंकड़े:
चुनाव आयोग ने बताया कि 16 लाख लोगों ने नया वोटर बनने के लिए आवेदन दिया, जिसकी जानकारी एक सप्ताह के भीतर जानकारी चुनाव आयोग को पब्लिक करनी चाहिए थी। इनमें से 8 लाख 21 हजार का डेटा चुनाव आयोग ने दिया है, जिसमें से 2 लाख नामों का डेटा काम का नहीं है क्योंकि इसमें पूरी डिटेल्स नहीं दी गईं हैं। मोटे तौर पर 6 लाख 51 हजार का डेटा ही काम का है।
मोटे तौर पर कहें तो अगर चुनाव आयोग को 100 लोगों के नाम का डेटा देना हो तो उसमें से केवल 39 नाम का ही डेटा अभी तक जारी किया है। (14 सितंबर तक)
जिसमें ऑब्जेक्शन का डेटा 1.80 लाख है, मतलब ऑब्जेक्शन का 51% चुनाव आयोग ने आंकड़ा दिया है।
अब चुनाव आयोग के इस डेटा का फर्जीवाड़ा देखिए जरा –
फॉर्म-6 का इस्तेमाल नया वोटर बनने के लिए किया जाता है, जिसे आमतौर पर 18-20 वर्ष या हद से हद 25 वर्ष के आयु के लोगों के द्वारा किया जाता है।
लेकिन आँकड़े बताते हैं कि: फॉर्म-6 भरने वालों में 41% नाम ऐसे लोगों के नाम हैं, जो 25 साल से ऊपर के हैं, हालाँकि 25 वर्ष से ज्यादा उम्र वालों के लिए फॉर्म 6 भरना गैरकानूनी नहीं है, लेकिन आश्चर्यजनक जरूर है कि कोई व्यक्ति पात्र होने के बावजूद भी 7 साल तक वोट ना डाले। जब फॉर्म-6 भरा जाता है, तब शपथ-पत्र में लिखना होता है कि “मैं पहली बार वोटर बनने के लिए आवेदन कर रहा हूँ, कृपया मुझे शामिल कीजिए”। सोचिए चुनाव आयोग ने कितने लोगों को कानून के तहत अपराधी बना दिया होगा ?
इसका मतलब हुआ कि उनसे जबरन झूठा हलफ़नामा दिलवाया गया, जो कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950, की धारा 31 के तहत अपराध है। सिर्फ़ 27% लोग 18-20 साल के हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि 65 लोग ऐसे मिले हैं, जो पहली बार वोटर बने हैं और उनकी उम्र 100 साल से भी ऊपर है।
Form-7 (Objections) में ग़लतियाँ और “Self-Objections”
14.09.2025 तक CEO Bihar की वेबसाइट पर 45,991 आपत्तियाँ (Form-7) अपलोड हुई थीं, जबकि 1,80,235 लोगों ने आपत्ति दर्ज की कराई थी।
रान करने वाली बात ये है कि इनमें से 26,598 (58%) केस में, व्यक्ति ने ख़ुद अपने ख़िलाफ़ ही आपत्ति दर्ज कराई। जो व्यक्ति दो महीने पहले अपने दस्तावेज लेकर मारा-मारा फिर रहा था अब वह खुद के खिलाफ आपत्ति दर्ज करवा रहा है।
इसका अर्थ ये हो सकता है; या तो ये लोग असल में शामिल ही नहीं हुए थे और उनके नाम पर फ़र्ज़ी आपत्तियाँ डाली गईं।
या फिर Enumeration Form और Objection Form दोनों ही बिना उनकी जानकारी के सिर्फ़ काग़ज़ पर भरे गए।
वहीं आपत्ति करने वालों में से 555 लोगों ने इस आधार पर आपत्ति जताई है कि वे स्वयं विदेशी हैं। इससे बड़ा मजाक कोई और हो सकता है क्या ?
वहीं आपत्ति करने वालों में 22 लोग ऐसे हैं, जिनके नाम पर खुद को मृत घोषित किया गया है। चुनाव आयोग ने शायद पहली बार देशवासियों को खुद की ‘मृत्यु’ के बारे में घोषणा करवाने का यह दुर्लभ मौका दिया है।
संभावना है कि इनमें ज्यादातर वो लोग हैं जिनके नाम काट दिए गए 65 लाख वोटर्स की सूची में है, यह चुनाव आयोग के उस झूठ का भंडाफोड़ करता है, जिसमें चुनाव आयोग सुप्रीम कोर्ट में कह रहा था कि कोई नाम गलत नहीं काटा गया।
ECI ने कोर्ट को बताया कि सिर्फ़ 33,000 लोग (65 लाख में से जिनके नाम हटाए गए थे) ने अपने नाम दोबारा जोड़ने के लिए क्लेम किया, लेकिन दूसरी तरफ़, 16 लाख से ज़्यादा “नए वोटरों” ने नाम जुड़वाने के लिए आवेदन दिया। असलियत ये है कि जिनके नाम पहले से वोटर लिस्ट में थे और ड्राफ्ट से हटा दिए गए, उन्हें भी मजबूर किया गया कि वे Form-6 भरें।
(प्रत्यक्ष मिश्रा पब्लिक पॉलिसी रिसर्चर हैं।)
इनसे [email protected] मेल पर संपर्क किया जा सकता है।